स्वामी हरिदास
स्वामी हरिदास ने जब श्याम ( कृष्ण ) और श्यामा ( श्याम की प्रिया राधा ) का दर्शन किया तो उन्होंने ये पंक्तियाँ कहीं :-
" माई री, सहज जोरी प्रकट भई, जु रंग की गौर स्याम घन दामिनी जैसे, प्रथम है हूती, अब हूँ, आगे हूँ, रही है, नं टरी है तैसे, अंग अंग की उजकाई सुघराई चतुराई सुंदरता ऐसे, हरिदास के स्वामी श्यामा-कुंजबिहारी सम वैसे वैसे ".
सरल हिंदी अर्थ :-
" ओ माँ, विवस्त्र नग्न सहज अवस्था मे जोड़ी प्रकट हुई, जो रंग की, गोरा रंग राधा का और काला रंग श्याम का, मिलके, काले बादल और उसमे चमकने वाली बिजली( दामिनी ) की तरह है. आकर्षित करने वाली, पास बुलाने वाली निमंत्रणों याचिकाओं ( हूती ) मे ये प्रथम है, ऐसी कोई ना अब है ( अब हूँ ), और ना भविष्य मे आगे कभी ( आगे हूँ ) होगी, और अपने पास बुलाने वाली ऐसी कोई युक्ती ( टरी ) नही है. क्योंकि इनका तेजपुंज चमकता अंग अंग ( उजकाई ), सुडौल, कमनीय, आकर्षक तन-बदन ( सुघराई ), स्वभाव की चतुराई, और सुंदरता, ऐसी है जैसे हरिदास के स्वामी कृष्ण और राधा की थी. ये जोड़ी, श्याम और श्यामा, इनका रूप ठीक वैसा का वैसा है, जैसा कृष्ण और राधा का था, जब उन्होंने जग मे जन्म लिया था ".
शब्द अर्थ :-
1 ) कुंज बिहारी :- "कुंज" याने वृक्ष लताओं के झुरमट से बने प्राकृतिक हरे छत, जिनके नीचे छांँव रहती है. और विश्राम करते हैं, जैसे बागीचे मे. "बिहारी" याने कुंज मे विहार ( मौज, मज़ा ) करने वाले श्याम.
2) बाँका :- आकर्षक, अच्छा तेज़ व्यक्तिमत्व वाला.
फिर स्वामी हरिदास ने श्याम और श्यामा को एकरूप होकर उनके पास मूर्ति रूप मे रहने की इच्छा की, और श्याम ( कृष्ण ) और श्यामा ( राधा ) एकदूसरे मे मिल गए, जैसे पानी मे पानी मिल जाता है. वो एकरूप मूर्ति, जिसे विग्रह भी केहते हैं, राधा के बदन की गोलाई, और श्याम की खंदे-छाती, और हाथ मे बाँसुरी के साथ थी, सो नाम पड़ गया
" बाँके-बिहारी ". !!!!
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जय बाँके बिहारी
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